Tuesday, February 9, 2010
क्या भारतीय टीम को अजेय रहने का वरदान मिला है?
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Sunday, February 7, 2010
काम से ही नाम की महत्ता
पर वह नहीं माना। आग्रह करता ही रहा। तब आचार्य ने कहा, “अर्थ-सिद्ध तो कर्म के सुधारने से होगा, परन्तु यदि तू नाम भी सुधारना चाहता है तो जा, गांव भर के लोगों को देख और जिसका नाम तुझे मांगलिक लगे, वह मुझे बता। तेरा नाम वैसा ही बदल दिया जायगा।”
पापक सुन्दर नामवालों की खोज में निकल पड़ा। घर से बाहर निकलते ही उसे शव-यात्रा के दर्शन हुए। पूछा, “कौन मर गया?” लोगों ने बताया “जीवक।” पापक सोचने लगा-नाम जीवक, पर मृत्यु का शिकार हो गया!
आगे बढ़ा तो देखा, किसी दीन-हीन गरीब दुखियारी स्त्री को मारपीट कर घर से, निकाला जा रहा है। पूछा, “कौन है यह?” उत्तर मिला, “धनपाली।” पापक सोचने लगा नाम धनपाली और पैसे-पैसे को मोहताज!
और आगे बढ़ा तो एक आदमी को लोगों से रास्ता पूछते पाया। नाम पूछा तो पता चला-पंथक। पापक फिर सोच में पड़ गया-अरे, पंथक भी पंथ पूछते हैं? पंथ भूलते हैं?
पापक वापस लौट आया। अब नाम के प्रति उसका आकर्षण दूर हो चुका था। बात समझ में आ गई थी। क्या पड़ा है नाम में? जीवक भी मरते हैं, अ-जीवक भी, धनपाली भी दरिद्र होती है, अधनपाली भी, पंथक राह भूलते हैं, अंपथक भी, जन्म का अंधा नाम नयनसुख, जन्म का दुखिया, नाम सदासुख! सचमुच नाम की थोथी महत्ता निरर्थक ही है। रहे नाम पापक, मेरा क्या बिगड़ता है? मैं कर्म सुधारुंगा। कर्म ही प्रमुख है, कर्म ही प्रधान है।
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Saturday, February 6, 2010
घरेलू गौरैया की घटती आबादी
भूमध्य क्षेत्र को घरेलू गौरैया का उद्गम स्थल समझा जाता है और सभ्यता के विकास के साथ-साथ यह यूरोप भर में पहुंच गई। मानव संपर्क में रहने की अपनी विशेषता के कारण गौरैया ने अटलांटिक से लेकर अमेरिका तक का सफर कर डाला। गौरेयों ने लोगों का विश्व के कई हिस्सों में जैसे उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका‚ दक्षिणी अफ्रीका‚ आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड तक सफलतापूर्वक पीछा किया।
घरेलू गौरैया एक बुद्धिमान चिड़िया है जिसने घोंसला स्थल‚ भोजन तथा आश्रय परिस्थितियों में अपने को उनके अनुकूल बनाया है। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण यह विश्व में सबसे ज्यादा पाई जाने वाली चहचहाती चिड़िया बन गयी।
गौरैया बहुत ही सामाजिक पक्षी है और ज्यादातर पूरे वर्ष झुंड में उड़ती है। गौरैया का प्रमुख आहार अनाज के दाने‚ जमीन में बिखरे दाने तथा पशु आहार है। अगर अनाज उपलब्ध न हो तो यह अन्य आहार से भी अपना पेट भर लेती है। ऐसे में ये खर–पतवार तथा खासकर प्रजनन मौसम के दौरान कीटों को भी खा लेती है।
घरेलू गौरैया साधारणतः वनों की ओर आराम करने‚ घोंसला बनाने तथा आश्रय खोजने के लिए आकर्षित होती है। ये अपना घोंसला बनाने के लिए मानव–निर्मित एकांत स्थानों या दरारों को तलाश करती हैं। घोंसला बनाने के लिए इनके अन्य स्थल हैं अलगनी का खुला हुआ किनारा‚ बरामदा‚ बगीचा इत्यादि। गौरैया अपना घर मानव आवास के निकट ही बनाती हैं।
गौरैया की संख्या में आकस्मिक कमी के विभिन्न कारण हैं‚ जिनमें से सबसे चौंकाने वाला कारण है सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग‚ जिसके जलने पर मिथाइल नाइट्रेट नामक यौगिक तैयार होता है। यह यौगिक छोटे जन्तुओं के लिए काफी जहरीला है। अन्य कारण हैं पनपते खर–पतवार की कमी या गौरैया को खुला आमंत्रण देने वाले ऐसे खुले वनों की कमी जहां वह अपने घोंसले बनाया करती थी। पक्षीविज्ञानी एवं वन्यप्राणी विशेषज्ञों का यह मानना है कि आधुनिक युग में पक्के मकान‚ लुप्त होते बाग–बगीचे‚ खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा भोज्य पदार्थ श्रोतों की उपलब्धता में कमी इत्यादि प्रमुख विभिन्न कारक हैं जो इनकी घटती आबादी के लिए जिम्मेवार हैं।
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मीडिया की चरण वन्दना
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Friday, February 5, 2010
पूर्णमद: पूर्णमिदम्
मां कुशल थी। उसने एक छोटा-सा गोल लड्डू बनाया। और बच्चे को परोस दिया। लड़का खुश हुआ, क्योंकि उसे पूरा लड्डू मिल गया था।
इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चा कहता है, “मेरा बाप जितना पूर्ण आत्मा है, उतना ही पूर्ण आत्मा मैं भी हूं। मैं छोटा हूं, पर टुकड़ा नहीं हूं।”
जो विश्व का राज होगा, वह बड़ा होगा और गांव का राज छोटा लड्डू होगा। पर वह भी पूर्ण होना चाहिए। इसीलिए हम हमेशा कहते हैं—“पूर्णमद: पूर्णमिदम्।”
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Thursday, February 4, 2010
लोग पत्रकार क्यों बनते है?
विद्वान जन हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि चीजों‚ संस्थाओं‚ व्यक्तियों की समालोचना होनी चाहिये न कि आलोचना। क्योंकि ऐसा होने से उसकी सही परख नहीं हो पायेगी याने सिक्के के दोनों पहलूओं के बारे में बताया जाना चाहिये। और सबसे बड़ी बात भाषा पर नियंत्रण होना चाहिये। परंतु तमाम राजनीतिज्ञों को उनकी भाषा के लिये कठघरे में खड़े करने वाले खुद ही कैसी भाषा इस्तेमाल करते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं। इन लोगों के लिये समालोचना तो शायद दूर की बात है ये संयत भाषा में आलोचना भी करते तब भी ठीक था परंतु अगर आप भाषा देखेंगे तो पता चल जायेगा कि अगर ऐसे लोग मीडिया में बैठे हैं तो समाज की स्थिति कैसी हो सकती है? अच्छा एक बात और समझ में नहीं आती की दूसरों को संयत रहने का उपदेश देने वाले खुद कभी कैसे अपनी भाषा पर नियंत्रण खो बैठते हैं। हर जगह टीवी पर‚ अखबार में‚ ब्लाग पर और न जाने कहां-कहां? दरअसल मन में पड़ी गांठे भी बड़ी अजीब होती हैं न जाने कब और कहां खुल जांयें और हमारे असली रुप को सबके सामने ले आये। गये थे सूट-बूट पहन कर सबको लुभाने के लिये जेंटलमैन बन कर। परंतु गांठें तो गांठें हैं सामने आ जाती है और हमारी सज्जनता धरी की धरी रह जाती हैं। तब लोगों को पता चलता है अच्छे कपड़े तो सिर्फ दिखावा हैं टाई तो सिर्फ दिखाने को पहनी है बालों का स्टाइल बदलने से मन नहीं बदल जाता अच्छे जूते पहनने से असलियत थोड़ी देर के लिये ही छुपती है।
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Sunday, January 31, 2010
पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये
आज जब पुरस्कार दिये जाते हैं तो काम से ज्यादा महत्व प्रसिद्धि को मिलता है। जो ज्यादा प्रसिद्धि है उसे जल्दी ही पुरस्कार मिल जाता है। परंतु यह भी तथ्य है कि कई लोग‚ जिन्होंने अपने क्षेत्र काफी अच्छा काम किया है पुरस्कार के कारण ही और लोगों के सामने उनके काम आ पाते हैं। क्योंकि हर क्षेत्र फिल्म और क्रिकेट की तरह ग्लैमरस नहीं है। अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों की उपलब्धियां पुरस्कार के कारण ही सामने आ पाती है। इसलिये पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये।
पुरस्कार चयन के मामले निश्चित ही पारदर्शिता होनी चाहिये और पुरस्कार देने से पहले व्यक्ति या संस्था के सभी आयामों की बारीकी से पड़ताल होनी चाहिये परंतु इन सबके बावजूद मानवीय स्वभाव आड़े आ ही जाता है और वह कहीं न कहीं झुक जाता है अब चाहे इसे क्षेत्रवाद का नाम दें विचारधारा कहें अथवा अपनों को उपकृत करने की लालसा। वैसे भी शक्तिशाली मीडिया के इस दौर में पुरस्कार चयन में हुआ भेदभाव तुरन्त ही सामने आ जाता है और सबसे बड़ी या अच्छी बात पुरस्कृत व्यक्ति की असलियत सामने आ जाती है।
कई लोग ऐसे हैं जो छोटे से इलाके में बेहतरीन काम करने में लगे हैं परंत हममें से कितने उनको और उनके काम के बारे में जानते हैं? एक उदाहरण चमोली जिले में हुआ चिपको आंदोलन है जिसमें पेड़ों को बचाने के लिये लोग पेड़ों से चिपक गये थे बाद में श्री चण्डी प्रसाद भट्ट को इस कार्य के लिये पदम श्री पुरस्कार दिया गया। तभी उनकी उपलब्धि राष्ट्र के सम्मुख आ पायी। आखिर ये पूरे देश के लोगों का हक है कि जो भी बेहतर हो रहा है उसकी जानकारी उन्हें मिले ताकि वे भी उसका लाभ ले पायें। और काफी हद तक पुरस्कारों के माध्यम से बेहतरीन कार्य लोगों के सम्मुख आ जाते हैं। इसलिये पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये।
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Friday, January 29, 2010
निष्पाप जीवन का रहस्य
एकनाथ ने कहा, “अभी मेरी बात छोड़ो। तुम्हारे संबंध में मुझे एक बात मालूम हुई है। आज से सात दिन के भीतर तुम्हारी मौत आ जायेगी।”
एकनाथ की कही बात को झूठ कौन मानता! सात दिन में मृत्यु! सिर्फ १६८ घंटे बाकी रहे! हे भगवान! यह क्या अनर्थ ? वह मनुष्य जल्दी-जल्दी घर दौड़ गया। कुछ सूझ नहीं पड़ता था। आखिरी समय की, सब कुछ समेट लेने की, बातें कर रहा था। वह बीमार हो गया। बिस्तर पर पड़ गया। छ: दिन बीत गये। सातवें दिन एक नाथ उससे मिलने आये। उसने नमसकार किया। एकनाथ ने पूछा, “क्या हाल है? ”
उसने कहा, “बस अब चला!”
नाथजी ने पूछा, “इन छ: दिनों में कितना पाप किया? पाप के कितने विचार मन में आये?”
वह मरणासन्न व्यक्ति बोला, “नाथजी, पाप का विचार करने की तो फुरसत ही नहीं मिली। मौत एक-सी आंखों के सामने खड़ी थी।”
नाथजी ने कहा, “हमारा जीवन इतना निष्पाप क्यों है, इसका उत्तर अब मिल गया न?”
मरण रुपी शेर सदैव सामने खड़ा रहे, तो फिर पाप सूझेगा किसे?
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