Tuesday, February 9, 2010

क्या भारतीय टीम को अजेय रहने का वरदान मिला है?

भारत दक्षिण अफ्रीका से पराजित क्या हुआ कि फिर शुरु हो गया खबरिया चैनलों का कोसने का खेल। भारत ने नाक कटायी। भारत के बल्लेबाज हुए फेल। नं0 एक की असलियत सामने आयी। मेहमान ने मेजबान को घर में ही पीटा। भई आखिर ये खेल ही तो है और इसमें कोई न कोई तो हारेगा ही। और फिर भारतीय टीम को भगवान का आशीर्वाद तो नहीं मिल गया जो वह सदैव अजेय रहेगी। अखिर कभी न कभी कहीं न कहीं तो हार होती है। हार और जीत तो सिक्के के दो पहलू है जो भी खेल में उतरेगा वह हारेगा भी और जीतेगा भी इसमें कोई बहुत आश्चर्य वाली बात नहीं है। कभी वक्त हमारे पक्ष में नहीं होता और सब कुछ होते हुए भी हम परास्त हो जाते हैं। और धोनी की टीम एक टेस्ट मैच हार भी गयी तो कौन सा आसमान टूट गया जैसा कि हमारे खबरिया चैनल दिखा रहे हैं। आखिर पिछले कुछ समय से ये टीम लगातार जीत भी रही थी। अब सदा तो कोई जीत नहीं सकता। औसत का नियम भी यही कहता है। कभी अजेय रही वेस्टइंडीज की टीम भी परास्त हुई है। लगातार नं0 एक रहने वाली आस्ट्रेलियाई टीम भी तो पराजित होकर नं0 एक की दौड़ से बाहर हो गयी तो फिर टीम इंडिया अगर हार गयी तो कौन सी आफत आ गयी। हार–जीत मायने नहीं रखती मुख्य बात तो खेल खेलना है खेल भावना से। और नं0 वन का क्या है आज अगर नं0 वन की कुर्सी हमारे हाथ से गयी है तो कल फिर मिल जायेगी। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। कुछ लोग सचिन को निशाना बना रहे हैं बात फिर वही आती है सचिन भी तो आखिर इंसान हैं कोई सुपरमैन तो नहीं। और अगर वो सुपरमैन होते तो शायद इस खेल का हम इतना लुत्फ नहीं उठा पाते। यदि हमेशा टीम इंडिया जीतती रहती तो शायद इस खेल के प्रति हमारा इतना लगाव नहीं होता। यह हार ही है जो हमें खेल से जोड़े रखती है इस आशा में कि शायद अगला मैच जीतेंगे। तो मीडिया को ये समझना होगा की ज्यादा लंबी नाक भी चेहरे की सुंदरता को खत्म कर देती है।

Sunday, February 7, 2010

काम से ही नाम की महत्ता

पुरानी बात हैं। किसी बालक के माँ-बाप ने उसका नाम पापक (पापी) रख दिया। बड़ा हुआ तो उसे यह नाम बहुत बुरा लगने लगा। उसने अपने आचार्य से प्रार्थना की, “मेरा नाम बदल दें। यह नाम बड़ा अप्रिय है, क्योंकि अशुभ और अमांगलिक है।” आचार्य ने उसे समझाया कि नाम तो केवल व्यवहार-जगत में पुकारने के लिए होता है। नाम बदलने से कोई मतलब सिद्ध नहीं होगा। कोई पापक नाम रखकर भी सत्कर्मों से धार्मिक बन सकता है और धार्मिक नाम रहे तो भी दुष्कर्मों से कोई पापी बन सकता है। मुख्य बात तो कर्म की है। नाम बदलने से क्या होगा?
पर वह नहीं माना। आग्रह करता ही रहा। तब आचार्य ने कहा, “अर्थ-सिद्ध तो कर्म के सुधारने से होगा, परन्तु यदि तू नाम भी सुधारना चाहता है तो जा, गांव भर के लोगों को देख और जिसका नाम तुझे मांगलिक लगे, वह मुझे बता। तेरा नाम वैसा ही बदल दिया जायगा।”
पापक सुन्दर नामवालों की खोज में निकल पड़ा। घर से बाहर निकलते ही उसे शव-यात्रा के दर्शन हुए। पूछा, “कौन मर गया?” लोगों ने बताया “जीवक।” पापक सोचने लगा-नाम जीवक, पर मृत्यु का शिकार हो गया!
आगे बढ़ा तो देखा, किसी दीन-हीन गरीब दुखियारी स्त्री को मारपीट कर घर से, निकाला जा रहा है। पूछा, “कौन है यह?” उत्तर मिला, “धनपाली।” पापक सोचने लगा नाम धनपाली और पैसे-पैसे को मोहताज!
और आगे बढ़ा तो एक आदमी को लोगों से रास्ता पूछते पाया। नाम पूछा तो पता चला-पंथक। पापक फिर सोच में पड़ गया-अरे, पंथक भी पंथ पूछते हैं? पंथ भूलते हैं?
पापक वापस लौट आया। अब नाम के प्रति उसका आकर्षण दूर हो चुका था। बात समझ में आ गई थी। क्या पड़ा है नाम में? जीवक भी मरते हैं, अ-जीवक भी, धनपाली भी दरिद्र होती है, अधनपाली भी, पंथक राह भूलते हैं, अंपथक भी, जन्म का अंधा नाम नयनसुख, जन्म का दुखिया, नाम सदासुख! सचमुच नाम की थोथी महत्ता निरर्थक ही है। रहे नाम पापक, मेरा क्या बिगड़ता है? मैं कर्म सुधारुंगा। कर्म ही प्रमुख है, कर्म ही प्रधान है।

Saturday, February 6, 2010

घरेलू गौरैया की घटती आबादी

देखने में सर्वत्र परिचित‚ सर्वव्यापी एवं कभी ज्यादा संख्या में दिखाई पड़ने वाली घरेलू गौरैया‚ पूरे विश्व में तेजी से दुर्लभ होती जा रही है। फुर्तीली और चहलकदमी करने वाली गौरैया को हमेशा शरदकालीन एवं शीतकालीन फसलों के दौरान‚ खेत–खलिहानों में अनेक छोटे–छोटे पक्षियों के साथ फुदकते देखा गया है। लेकिन अब तो कई सप्ताह इन्हें बिना देखे ही निकल जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में‚ भारत के साथ-साथ विश्व के मानचित्र पर भी गौरैया की संख्या में भारी कमी देखी गयी है। यूरोप के बड़े हिस्से में कभी सामान्य रूप से दिखाई पड़ने वाली इन चिड़ियों की संख्या अब घट रही है।
भूमध्य क्षेत्र को घरेलू गौरैया का उद्गम स्थल समझा जाता है और सभ्यता के विकास के साथ-साथ यह यूरोप भर में पहुंच गई। मानव संपर्क में रहने की अपनी विशेषता के कारण गौरैया ने अटलांटिक से लेकर अमेरिका तक का सफर कर डाला। गौरेयों ने लोगों का विश्व के कई हिस्सों में जैसे उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका‚ दक्षिणी अफ्रीका‚ आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड तक सफलतापूर्वक पीछा किया।
घरेलू गौरैया एक बुद्धिमान चिड़िया है जिसने घोंसला स्थल‚ भोजन तथा आश्रय परिस्थितियों में अपने को उनके अनुकूल बनाया है। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण यह विश्व में सबसे ज्यादा पाई जाने वाली चहचहाती चिड़िया बन गयी।
गौरैया बहुत ही सामाजिक पक्षी है और ज्यादातर पूरे वर्ष झुंड में उड़ती है। गौरैया का प्रमुख आहार अनाज के दाने‚ जमीन में बिखरे दाने तथा पशु आहार है। अगर अनाज उपलब्ध न हो तो यह अन्य आहार से भी अपना पेट भर लेती है। ऐसे में ये खर–पतवार तथा खासकर प्रजनन मौसम के दौरान कीटों को भी खा लेती है।
घरेलू गौरैया साधारणतः वनों की ओर आराम करने‚ घोंसला बनाने तथा आश्रय खोजने के लिए आकर्षित होती है। ये अपना घोंसला बनाने के लिए मानव–निर्मित एकांत स्थानों या दरारों को तलाश करती हैं। घोंसला बनाने के लिए इनके अन्य स्थल हैं अलगनी का खुला हुआ किनारा‚ बरामदा‚ बगीचा इत्यादि। गौरैया अपना घर मानव आवास के निकट ही बनाती हैं।
गौरैया की संख्या में आकस्मिक कमी के विभिन्न कारण हैं‚ जिनमें से सबसे चौंकाने वाला कारण है सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग‚ जिसके जलने पर मिथाइल नाइट्रेट नामक यौगिक तैयार होता है। यह यौगिक छोटे जन्तुओं के लिए काफी जहरीला है। अन्य कारण हैं पनपते खर–पतवार की कमी या गौरैया को खुला आमंत्रण देने वाले ऐसे खुले वनों की कमी जहां वह अपने घोंसले बनाया करती थी। पक्षीविज्ञानी एवं वन्यप्राणी विशेषज्ञों का यह मानना है कि आधुनिक युग में पक्के मकान‚ लुप्त होते बाग–बगीचे‚ खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग तथा भोज्य पदार्थ श्रोतों की उपलब्धता में कमी इत्यादि प्रमुख विभिन्न कारक हैं जो इनकी घटती आबादी के लिए जिम्मेवार हैं।

मीडिया की चरण वन्दना

ठाकरे के गढ़ में वेफिक्र घूमे राहुल‚ शिवसेना के गढ़ में राहुल राज‚ मांद में रहा शेर‚ शिव सेना का अभियान टांय–टांय फिस्स और भी बहुत सारे जुमले गढ़े जा रहे हैं राहुल गांधी की मुंबई यात्रा पर। मीडिया ने ठाकरे परिवार को बिल्कुल ही चुका हुआ करार दे दिया है। मंत्री जी ने तो सिर्फ जूते ही उठाये परंतु चरण वन्दना करने में मीडिया भी पीछे नहीं रहा। अब मीडिया को कौन समझाये की जब स्वयं मुख्यमंत्री चहवाण सुरक्षा की स्वयं ब्रीफींग कर रहे हों तो फिर राहुल गांधी के साथ हो भी क्या सकता था? कोई कर क्या सकता था? बात तो आम आदमी और गरीब ठेले खोमचे वालों की है जिन्हें इतनी सुरक्षा तामझाम उपलब्ध नहीं है। यदि उन्हें ठाकरों से सुरक्षा दी जाये तो बात बने और क्या राहुल के एक दौरे से वे लोग सुरक्षित हो गये हैं? क्या अब उन्हें इन हुड़दंगियों द्वारा और तंग नहीं किया जायेगा? इस बात की गारंटी देंगे युवराज? ऐसी चाक–चौबंद सुरक्षा में तो कोई भी मुंबई क्या दुनिया के किसी भी अशांत इलाके के चक्कर आसानी से लगा लेगा। तारीफ तो तब की जा सकती है जब आम उत्तर भारतीय भी पूरी तरह सुरक्षित हो। लोकल ट्रेन में राहुल के सफर करने से क्या उत्तर भारतीयों की यात्रा आसान हो जायेगी? और राहुल की यात्रा से तो और सवाल उठ खड़े हुए हैं‚ क्या पुलिस और प्रशासन सिर्फ वीआईपी की सुरक्षा के लिये है और आम आदमी की सुरक्षा का क्या? पूरे देश के लोग कम से कम इस यात्रा से इतना तो जान ही गये हैं कि अगर मुंबई में पुलिस इसी प्रकार सक्रिय रहती तो टैक्सी वाले‚ खोमचे वाले और गरीब उत्तर भारतीय नहीं पिटते। मजाल थी किसी की‚ वो किसी को प्रताड़ित कर पाता‚ परंतु यहां तो बाढ़ ही खेत को खाने में लगी है। काश ऐसी ही सुरक्षा आम आदमी की हो पाती‚ उसको दी जाती। और सरकार तो सरकार‚ मीडिया की आंखों पर भी पर्दा पड़ा हुआ है। वह इस यात्रा को सफल बताकर आम आदमी को भरमाने में लगा हुआ है।

Friday, February 5, 2010

पूर्णमद: पूर्णमिदम्

एक दफा एक पिता और पुत्र खाने बैठे। पिता की थाली में मां ने एक पूरा लड्डू रखा और बच्चे की थाली में आधा। बच्चा रोने लगा, हठ करने लगा कि हमे पूरा ही लड्डू चाहिए।
मां कुशल थी। उसने एक छोटा-सा गोल लड्डू बनाया। और बच्चे को परोस दिया। लड़का खुश हुआ, क्योंकि उसे पूरा लड्डू मिल गया था।
इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चा कहता है, “मेरा बाप जितना पूर्ण आत्मा है, उतना ही पूर्ण आत्मा मैं भी हूं। मैं छोटा हूं, पर टुकड़ा नहीं हूं।”
जो विश्व का राज होगा, वह बड़ा होगा और गांव का राज छोटा लड्डू होगा। पर वह भी पूर्ण होना चाहिए। इसीलिए हम हमेशा कहते हैं—“पूर्णमद: पूर्णमिदम्।”

Thursday, February 4, 2010

लोग पत्रकार क्यों बनते है?

लोग पत्रकार क्यों बनते है? पत्रकार बनने के पीछे उनके उद्देश्य क्या हैं? क्या वह लोगों की समस्याओं को आगे लाने के लिये पत्रकार बने हैं या उनकी रुचि समाज में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ आवाज उठाने में है अथवा फिर एक व्यवसाय के तौर पर उन्होंने इसे चुना है? मेरे पास जो कारण है वह सबसे अलग है। कुछ लोग असफलता के कारण पत्रकार बनते हैं चाहते थे बड़ा बनना‚ महान बनना‚ सफल बनना परंतु रह गये छोटे हो गये असफल। जीवन के कठोर धरातल पर इस कठोर सच्चाई से उनका सामना हुआ तो वे कुंठित हो गये। लोगों की सफलता‚ महानता सब कुछ सालने लगता है उनको। और फिर वे कुछ ऐसा व्यवसाय चुनने के लिये मजबूर हो जाते हैं कि न हो सके सफल तो क्या? न बन सके महान तो क्या परंतु सफल लोगों के बीच रह तो सकते हैं महान लोगों से बात तो कर सकते हैं और अगर जरुरत पड़ी तो उनकी सफलता में मीनमेख तो निकाला ही जा सकता है। इससे अपना अहं भी संतुष्ट हो जायेगा और हम सफल न बन सके तो क्या दूसरे को भी सफलता का स्वाद आसानी से नहीं चखने देंगे। परंतु होता क्या है फ्रस्टेशन और बढ़ जाती है आप रोज टीवी पर समाचार बांच रहे हैं लोग देख भी रहे हैं परंतु जब कहीं सार्वजनिक जीवन में किसी से मुलाकात होती है तो लोग पहचान ही नहीं पाते हैं यार लोग बताते भी हैं अरे ये उस खबरिया चैनल में समाचार बांचता है परंतु फिर भी कई लोग अनभिज्ञता जताते हैं। कारण आप फोकस में नहीं होते। फोकस में होती हैं खबरें‚ हस्तीयां और दूसरी चीजें।
विद्वान जन हमेशा इस बात पर जोर देते हैं कि चीजों‚ संस्थाओं‚ व्यक्तियों की समालोचना होनी चाहिये न कि आलोचना। क्योंकि ऐसा होने से उसकी सही परख नहीं हो पायेगी याने सिक्के के दोनों पहलूओं के बारे में बताया जाना चाहिये। और सबसे बड़ी बात भाषा पर नियंत्रण होना चाहिये। परंतु तमाम राजनीतिज्ञों को उनकी भाषा के लिये कठघरे में खड़े करने वाले खुद ही कैसी भाषा इस्तेमाल करते हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं। इन लोगों के लिये समालोचना तो शायद दूर की बात है ये संयत भाषा में आलोचना भी करते तब भी ठीक था परंतु अगर आप भाषा देखेंगे तो पता चल जायेगा कि अगर ऐसे लोग मीडिया में बैठे हैं तो समाज की स्थिति कैसी हो सकती है? अच्छा एक बात और समझ में नहीं आती की दूसरों को संयत रहने का उपदेश देने वाले खुद कभी कैसे अपनी भाषा पर नियंत्रण खो बैठते हैं। हर जगह टीवी पर‚ अखबार में‚ ब्लाग पर और न जाने कहां-कहां? दरअसल मन में पड़ी गांठे भी बड़ी अजीब होती हैं न जाने कब और कहां खुल जांयें और हमारे असली रुप को सबके सामने ले आये। गये थे सूट-बूट पहन कर सबको लुभाने के लिये जेंटलमैन बन कर। परंतु गांठें तो गांठें हैं सामने आ जाती है और हमारी सज्जनता धरी की धरी रह जाती हैं। तब लोगों को पता चलता है अच्छे कपड़े तो सिर्फ दिखावा हैं टाई तो सिर्फ दिखाने को पहनी है बालों का स्टाइल बदलने से मन नहीं बदल जाता अच्छे जूते पहनने से असलियत थोड़ी देर के लिये ही छुपती है।

Sunday, January 31, 2010

पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये

पिछले दिनों घोषित हुए पद्म पुरस्कार भी विवादों के घेरे में रहे हैं। कई लोगों ने इन पुरस्कारों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए इन्हे बंद किये जाने की वकालत की है। परंतु तमाम विवादों के बाद भी पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये। सालों से पुरस्कार और विवादों का चोली–दामन का साथ रहा है। जहां भी पुरस्कार बंटे वहीं विवाद शुरु हुए हैं। परंतु इस कारण सदियों पुरानी परंपरा को छोड़ा नहीं जा सकता। व्यक्तियों के कामों का मूल्यांकन करने का यही श्रेष्ठ तरीका है। कहा जा सकता है कि पुरस्कार चयन के मामले में भेदभाव होता है और अक्सर पुरस्कार प्रदान करने वाली समिति को कई दबावों के कारण कुछ गलत फैसले भी लेने पड़ते हैं परंतु इन सबके बावजूद बेहतर लोगों को भी पुरस्कार मिले हैं।
आज जब पुरस्कार दिये जाते हैं तो काम से ज्यादा महत्व प्रसिद्धि को मिलता है। जो ज्यादा प्रसिद्धि है उसे जल्दी ही पुरस्कार मिल जाता है। परंतु यह भी तथ्य है कि कई लोग‚ जिन्होंने अपने क्षेत्र काफी अच्छा काम किया है पुरस्कार के कारण ही और लोगों के सामने उनके काम आ पाते हैं। क्योंकि हर क्षेत्र फिल्म और क्रिकेट की तरह ग्लैमरस नहीं है। अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों की उपलब्धियां पुरस्कार के कारण ही सामने आ पाती है। इसलिये पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये।
पुरस्कार चयन के मामले निश्चित ही पारदर्शिता होनी चाहिये और पुरस्कार देने से पहले व्यक्ति या संस्था के सभी आयामों की बारीकी से पड़ताल होनी चाहिये परंतु इन सबके बावजूद मानवीय स्वभाव आड़े आ ही जाता है और वह कहीं न कहीं झुक जाता है अब चाहे इसे क्षेत्रवाद का नाम दें विचारधारा कहें अथवा अपनों को उपकृत करने की लालसा। वैसे भी शक्तिशाली मीडिया के इस दौर में पुरस्कार चयन में हुआ भेदभाव तुरन्त ही सामने आ जाता है और सबसे बड़ी या अच्छी बात पुरस्कृत व्यक्ति की असलियत सामने आ जाती है।
कई लोग ऐसे हैं जो छोटे से इलाके में बेहतरीन काम करने में लगे हैं परंत हममें से कितने उनको और उनके काम के बारे में जानते हैं? एक उदाहरण चमोली जिले में हुआ चिपको आंदोलन है जिसमें पेड़ों को बचाने के लिये लोग पेड़ों से चिपक गये थे बाद में श्री चण्डी प्रसाद भट्ट को इस कार्य के लिये पदम श्री पुरस्कार दिया गया। तभी उनकी उपलब्धि राष्ट्र के सम्मुख आ पायी। आखिर ये पूरे देश के लोगों का हक है कि जो भी बेहतर हो रहा है उसकी जानकारी उन्हें मिले ताकि वे भी उसका लाभ ले पायें। और काफी हद तक पुरस्कारों के माध्यम से बेहतरीन कार्य लोगों के सम्मुख आ जाते हैं। इसलिये पुरस्कार तो दिये ही जाने चाहिये।

Friday, January 29, 2010

निष्पाप जीवन का रहस्य

एक सज्जन ने एकनाथ से पूछा, “महाराज, आपका जीवन कितना सीधा-साधा और निष्पाप है! हमारा जीवन ऐसा क्यों नहीं ? आप कभी किसी पर गुस्सा नहीं होते। किसी से लड़ाई झगड़ा नहीं, टंटा-बखेड़ा नहीं। कितने शांत, कितने प्रेमपूर्ण, कितने पवित्र हैं आप!”
एकनाथ ने कहा, “अभी मेरी बात छोड़ो। तुम्हारे संबंध में मुझे एक बात मालूम हुई है। आज से सात दिन के भीतर तुम्हारी मौत आ जायेगी।”
एकनाथ की कही बात को झूठ कौन मानता! सात दिन में मृत्यु! सिर्फ १६८ घंटे बाकी रहे! हे भगवान! यह क्या अनर्थ ? वह मनुष्य जल्दी-जल्दी घर दौड़ गया। कुछ सूझ नहीं पड़ता था। आखिरी समय की, सब कुछ समेट लेने की, बातें कर रहा था। वह बीमार हो गया। बिस्तर पर पड़ गया। छ: दिन बीत गये। सातवें दिन एक नाथ उससे मिलने आये। उसने नमसकार किया। एकनाथ ने पूछा, “क्या हाल है? ”
उसने कहा, “बस अब चला!”
नाथजी ने पूछा, “इन छ: दिनों में कितना पाप किया? पाप के कितने विचार मन में आये?”
वह मरणासन्न व्यक्ति बोला, “नाथजी, पाप का विचार करने की तो फुरसत ही नहीं मिली। मौत एक-सी आंखों के सामने खड़ी थी।”
नाथजी ने कहा, “हमारा जीवन इतना निष्पाप क्यों है, इसका उत्तर अब मिल गया न?”
मरण रुपी शेर सदैव सामने खड़ा रहे, तो फिर पाप सूझेगा किसे?